ऐ ख़ूब-रू फ़रिश्ता सियर-अंजुमन में आ

सर्व-ए-रवान-ए-हुस्न हमारे चमन में आ

मुँह बाँध कर कली सा न रह मेरे पास तू
ख़ंदाँ हो कर के गुल की सिफ़त टुक सुख़न में आ

उश्शाक़ जाँ-ब-कफ़ खड़े हैं तेरे आस-पास
ऐ दिल-रुबा-ए-ग़ारत-ए-जाँ अपने फ़न में आ

दूरी न कर कनार सूँ मेरी तू ऐ हुमा
कब लग रहेगा दूर तक अपने वतन में आ

तेरे मिलाप बिन नहीं 'फ़ाएज़' के दिल को चैन
जिऊँ रूह हो बसा है तू उस के बदन में आ

— Faez Dehlvi

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