मुँह फूल से रंगीं था व सारी थी उस हरी
खतरानी एक देखी मैं पनघट पे ज्यूँँ परी
चीरी हैं उस की उर्बसी रम्भा ओ राधिका
प्रभू ने फिर बनाई नहीं वैसी दूसरी
मैं ने कहा कि घर चलेगी मेरे साथ आज
कहने लगी कि हम सूँ न कर बात तू बुरी
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