zabt kijeye to dil hai angaara | ज़ब्त कीजे तो दिल है अँगारा

  - Firaq Gorakhpuri

ज़ब्त कीजे तो दिल है अँगारा
और अगर रोइए तो पानी है

  - Firaq Gorakhpuri

Paani Shayari

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    आज आख़िरी दफ़ा था पानी से पेट भरना
    बच्चों ने आज जाके घर में अनाज देखा
    Amaan Pathan
    हो गए राम जो तुम ग़ैर से ए जान-ए-जहाँ
    जल रही है दिल-ए-पुर-नूर की लंका देखो
    Kalb-E-Hussain Nadir
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    अगर साए से जल जाने का इतना ख़ौफ़ था तो फिर
    सहर होते ही सूरज की निगहबानी में आ जाते
    Azm Shakri
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    सबको बस पानी पीने से मतलब है
    बस माँ को चिंता है मटका भरने की
    Tanoj Dadhich
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    जो यहां ख़ुद ही लगा रक्खी है चारों जानिब
    एक दिन हम ने इसी आग में जल जाना है
    Zafar Iqbal
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    गिले शिकवे ज़रूरी हैं अगर सच्ची मुहब्बत है
    जहाँ पानी बहुत गहरा हो थोड़ी काई रहती है
    Munawwar Rana
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    मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में
    कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में

    क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
    ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में

    तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा
    काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में

    डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझको
    भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में

    सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा
    तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में

    फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू
    बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में

    सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा
    दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में
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    Anis shah anis
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    ज़हीफ़ी इस लिए मुझको सुहानी लग रही है
    इसे कमाने में पूरी जवानी लग रही है

    नतीजा ये है कि बरसों तलाश-ए-ज़ात के बाद
    वहाँ खड़ा हूँ जहाँ रेत पानी लग रही है
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    Khalid Sajjad
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    लगा आग पानी को दौड़े है तू
    ये गर्मी तेरी इस शरारत के बाद
    Meer Taqi Meer
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    ऐसा बदला हूँ तिरे शहर का पानी पी कर
    झूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को
    Shahid Zaki
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As you were reading Shayari by Firaq Gorakhpuri

    कुछ न कुछ इश्क़ की तासीर का इक़रार तो है
    उस का इल्ज़ाम-ए-तग़ाफ़ुल पे कुछ इंकार तो है

    हर फ़रेब-ए-ग़म-ए-दुनिया से ख़बर-दार तो है
    तेरा दीवाना किसी काम में हुश्यार तो है

    देख लेते हैं सभी कुछ तिरे मुश्ताक़-ए-जमाल
    ख़ैर दीदार न हो हसरत-ए-दीदार तो है

    माअरके सर हों उसी बर्क़-ए-नज़र से ऐ हुस्न
    ये चमकती हुई चलती हुइ तलवार तो है

    सर पटकने को पटकता है मगर रुक रुक कर
    तेरे वहशी को ख़याल-ए-दर-ओ-दीवार तो है

    इश्क़ का शिकवा-ए-बेजा भी न बे-कार गया
    न सही जौर मगर जौर का इक़रार तो है

    तुझ से हिम्मत तो पड़ी इश्क़ को कुछ कहने की
    ख़ैर शिकवा न सही शुक्र का इज़हार तो है

    इस में भी राबता-ए-ख़ास की मिलती है झलक
    ख़ैर इक़रार-ए-मोहब्बत न हो इंकार तो है

    क्यूँ झपक जाती है रह रह के तिरी बर्क़-ए-निगाह
    ये झिजक किस लिए इक कुश्ता-ए-दीदार तो है

    कई उन्वान हैं मम्नून-ए-करम करने के
    इश्क़ में कुछ न सही ज़िंदगी बे-कार तो है

    सहर-ओ-शाम सर-ए-अंजुमन-ए-नाज़ न हो
    जल्वा-ए-हुस्न तो है इश्क़-ए-सियहकार तो है

    चौंक उठते हैं 'फ़िराक़' आते ही उस शोख़ का नाम
    कुछ सरासीमगी-ए-इश्क़ का इक़रार तो है
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    Firaq Gorakhpuri
    मैं देर तक तुझे ख़ुद ही न रोकता लेकिन
    तू जिस अदा से उठा है उसी का रोना है
    Firaq Gorakhpuri
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    ये न पूछ कितना जिया हूँ मैं ये न पूछ कैसे जिया हूँ मैं
    कि अबद की आँख भी लग गई मेरे ग़म की शाम-ए-दराज़ में
    Firaq Gorakhpuri
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    सुनते हैं इश्क़ नाम के गुज़रे हैं इक बुज़ुर्ग
    हम लोग भी फ़क़ीर इसी सिलसिले के हैं
    Firaq Gorakhpuri
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    सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं
    लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं

    दिल की गिनती न यगानों में न बेगानों में
    लेकिन उस जल्वा-गह-ए-नाज़ से उठता भी नहीं

    मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त
    आह अब मुझ से तिरी रंजिश-ए-बेजा भी नहीं

    एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें
    और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

    आज ग़फ़लत भी उन आँखों में है पहले से सिवा
    आज ही ख़ातिर-ए-बीमार शकेबा भी नहीं

    बात ये है कि सुकून-ए-दिल-ए-वहशी का मक़ाम
    कुंज-ए-ज़िंदाँ भी नहीं वुसअ'त-ए-सहरा भी नहीं

    अरे सय्याद हमीं गुल हैं हमीं बुलबुल हैं
    तू ने कुछ आह सुना भी नहीं देखा भी नहीं

    आह ये मजमा-ए-अहबाब ये बज़्म-ए-ख़ामोश
    आज महफ़िल में 'फ़िराक़'-ए-सुख़न-आरा भी नहीं

    ये भी सच है कि मोहब्बत पे नहीं मैं मजबूर
    ये भी सच है कि तिरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं

    यूँ तो हंगामे उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क़
    मगर ऐ दोस्त कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं

    फ़ितरत-ए-हुस्न तो मा'लूम है तुझ को हमदम
    चारा ही क्या है ब-जुज़ सब्र सो होता भी नहीं

    मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि 'फ़िराक़'
    है तिरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं
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    Firaq Gorakhpuri

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