सिरात-ए-इश्क़ पर देखा जो चल के

मिले हम ख़ाक में आतिश में जल के

गुल-ओ-बुलबुल से अपना वास्ता क्या
हुए हैं हम जवाँ सहरा में पल के

ज़ियादा-तर कटी है उम्र तन्हा
मिले साथी मगर दो चार पल के

मुझे सोने नहीं देती वो शब भर
जगाती है जो फ़ित्ने शाम ढल के

हर इक पर थी निगाह-ए-फ़ैज़ उन की
हमीं थे रह गए जो हाथ मल के

छुपे होते हैं ख़ंजर आस्तीं में
मिलाना हाथ तो यारो सँभल के

जो लब तक आ नहीं सकतीं वो आहें
टपक जाती हैं आँखों से निकल के

तलाश-ए-रिज़्क़ से फ़ुर्सत मिले गर
तो रख दें हम ज़माने को बदल के

मिरा दिल आज की फ़िक्रों में गुम है
सजाऊँ ख़्वाब क्या 'आतिश' मैं कल के

— Gaurav 'aatish'

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