इक शख़्स मेरी ज़िंदगी से क्या चला गयायूँ लग रहा है जैसे ख़ुदा था, चला गयाआँखों पे कोई रौशनी पड़ती चली गईरस्ते से अपने फिर मैं भटकता चला गया— gulab muntazir