इक तरफ़ा प्यार का ये फ़साना अजीब है
रहता वो उतनी दूर है जितना क़रीब है
दो दिन की चाहतों का सिला माॅंगता है वो
उस को ये लग रहा है बड़ा ख़ुश-नसीब है
मुझ को न मिल सका तो मुझे कोई ग़म नहीं
जिस को भी तू मिला है उसी का नसीब है
ये दिल तो कर रहा था मुहब्बत पे ऐतराज़
इस को ख़बर नहीं थी यही बद-नसीब है
रहता नहीं वो सामने कोई भी ग़म नहीं
लेकिन ख़ुदा का फ़ज़्ल वो मेरा हबीब है
शायद तुम्हारे इश्क़ का बस है यही सिला
जिस से भी तुम ने इश्क़ किया वो ग़रीब है
— Hameed Sarwar Bahraichi















