इक तरफ़ा प्यार का ये फ़साना अजीब है
रहता वो उतनी दूर है जितना क़रीब है
दो दिन की चाहतों का सिला माॅंगता है वो
उसको ये लग रहा है बड़ा ख़ुश-नसीब है
मुझको न मिल सका तो मुझे कोई ग़म नहीं
जिसको भी तू मिला है उसी का नसीब है
ये दिल तो कर रहा था मुहब्बत पे ऐतराज़
इसको ख़बर नहीं थी यही बद-नसीब है
रहता नहीं वो सामने कोई भी ग़म नहीं
लेकिन ख़ुदा का फ़ज़्ल वो मेरा हबीब है
शायद तुम्हारे 'इश्क़ का बस है यही सिला
जिस सेे भी तुमने 'इश्क़ किया वो ग़रीब है
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