kuchh din se is darza sehama sehama hooñ | कुछ दिन से इस दर्ज़ा सहमा सहमा हूँ

  - Harsh saxena

कुछ दिन से इस दर्ज़ा सहमा सहमा हूँ
जैसे उसको रुख़्सत करके लौटा हूँ

बारिश में इतनी तो ख़ैर सहूलत है
रो कर अपना ग़म हल्का कर सकता हूँ

मुझसे बिछड़कर तुझ
में भी कुछ बचा नहीं
मैं भी बिन तेरे आधा सा लगता हूँ

मजनूँ जैसा हाल भला कैसे कर लूँ
अपने घर का मैं इकलौता बेटा हूँ

बाद तुम्हारे यार सँभलना मुश्किल है
इस जुमले से रिश्ता ज़िंदा रखता हूँ

'उम्र से मेरी फ़नकारी को मत आँको
उस्तादों से बेहतर ग़ज़लें कहता हूँ

मुझको 'इश्क़ के पर्चे में कुछ छूट मिले
ग़ौर से देखो मैं चेहरे से पिछड़ा हूँ

क़ैद करेंगी मुझको कैसे ज़ंजीरें
जिस्म नहीं हूँ मैं तो केवल साया हूँ

मुझसे पूछो रस्ते की दुश्वारी ‘हर्ष’
मंज़िल तक मैं क़दम क़दम पर झुलसा हूँ

  - Harsh saxena

Baarish Shayari

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