sukoon milta nahin jab bhi to maa ki yaad aati hai | सुकूँ मिलता नहीं जब भी तो माँ की याद आती है

  - Harsh saxena

सुकूँ मिलता नहीं जब भी तो माँ की याद आती है
कि जैसे बारिशों की रुत में छतरी याद आती है

कहीं इस शहर की आब-ओ-हवा में दम न घुट जाए
कि मुझको गाँव की सौंधी सी मिट्टी याद आती है

तरक़्क़ी के शिखर पर जब पहुँचते हैं तो अक्सर ही
वो ना-समझी में ज़ाया' की जवानी याद आती है

दिखाऊँ 'इश्क़ की पाकीज़गी कैसे तुम्हें जानाँ
ख़ुदा के ज़िक्र पर अक्सर तुम्हारी याद आती है

भला वो बाप हाथों के किसे छाले दिखाए अब
जिसे घर बैठी इक बेटी सियानी याद आती है

सबब मत पूछना मुझसे तुम उसको याद करने का
मरज़ के हद से बढ़ने पर दवाई याद आती है

वो लड़की, छोड़ आया था जिसे मैं बद-गुमानी में
अकेले में वही लड़की सिसकती याद आती है

इसी उम्मीद पर अब तक ग़ज़ल कहता रहा हूँ मैं
कभी वो पूछ ले शायद कि किसकी याद आती है

मुसीबत मोल लेने की है इक तरकीब ये भी 'हर्ष'
उसे इतना कहो तेरी सहेली याद आती है

  - Harsh saxena

Maa Shayari

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