इश्क़ का रोग बुरा है ये ज़माने के लिए
आज आया हूँ मैं ये सब को बताने के लिए
कैसे कहता मैं उसे रिश्ता निभाने के लिए
पाँव बढ़ते नहीं हैं हाथ मिलाने के लिए
हाल दिल का तो वो चेहरे से ही पढ़ लेती है
झूठ मैं लाख कहूँ सच को छुपाने के लिए
क्यूँ जुदाई का वो इल्ज़ाम हमें देते हैं
हम ने सब कुछ किया था रिश्ता बचाने के लिए
क़ब्र से चीख़ के चिल्ला के मैं ये कहता हूँ
ख़ुद-कुशी कम है तेरी याद भुलाने के लिए
— Harshwardhan Aurangabadi















