कोई अच्छा नहीं ख़ानदाँ में मेरे
डोर भिड़ती रही आसमाँ में मेरे
उस का दर भी खुला का खुला रह गया
और चिट्ठी पड़ी है मकाँ में मेरे
मैं भी जी भर के कुछ देर रो लूँ मगर
कोई मरता नहीं ख़ानदाँ में मेरे
एक मैला बदन भी चलेगा मुझे
रूह टिकती नहीं इस मकाँ में मेरे
सैकड़ों हैं मरे सैकड़ों हैं जिए
एक तू ही नहीं इस जहाँ में मेरे
— habib kinkhabwala














