तंग आ गया मैं इस बनावटी समाज से

अब मुझे भी सीखना है हर फ़रेब आज से

उम्र ये तो कट रही है इंतिज़ार में ही अब
ज़ख़्म भी मेरे थके हुए हैं हर इलाज से

याद दिल से कब किसी की कौन है मिटा सका
कौन है जो रौशनी जुदा करे सिराज से

कौन है यक़ीन कर रहा किसी पे अब यहाँ
है जिसे यक़ीन वो न बच सका रिवाज से

— Shivam Mishra

More by Shivam Mishra

Other ghazal from the same pen

See all from Shivam Mishra →

Dil Shayari

Shers of dil.

All Dil Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling