दर्द बे-शक ही अपने छुपाया करो
महफ़िलों में मगर आया जाया करो
ज़िंदगी रो के कटती नहीं दोस्तो
चोट खा कर के भी मुस्कुराया करो
कैसे रहते हैं ज़िंदा बुरे वक़्त में
ये हुनर नस्ल-ए-नौ को सिखाया करो
उम्र भर बोझ कोई उठाता नहीं
यार थोड़ा बहुत तो कमाया करो
इन की क़ीमत समझता नहीं है कोई
अश्क दुनिया से अपने छुपाया करो
लोग बुज़दिल समझने लगेंगे तुम्हें
सब के आगे न सर को झुकाया करो
बद-नज़र लग न जाए तुम्हें इसलिए
जान काला सा टीका लगाया करो
इश्क़ कर ही लिया है तो माशूक़ के
नाज़-ओ-नख़रे भी 'सागर' उठाया करो
— SAAGAR SINGH RAJPUT















