मुहब्बत से हसीनों को निहारोगे तो समझोगे

हसीं बाहों में जब क़िस्मत सँवारोगे तो समझोगे

ज़माने भर के पत्थर किस लिए मजनूँ ने खाए हैं
जब अपना दिल किसी लैला पे हारोगे तो समझोगे

किनारे से नहीं मिलता कभी अंदाज़ तूफ़ाँ का
सफ़ीने को तलातुम में उतारोगे तो समझोगे

किसी का साथ कोई क्यूँ नहीं देता ज़माने में
मुसीबत में किसी को जब पुकारोगे तो समझोगे

कोई मुफ़लिस नहीं कहता किसी से दर्द क्यूँ अपना
कभी फ़ाक़ों में अपनी शब गुज़ारोगे तो समझोगे

किसी बच्चे के सर पे माँ का साया क्यूँ ज़रूरी है
नज़र हाथों से अपने जब उतारोगे तो समझोगे

बताने से न समझोगे कभी तुम दर्द 'सागर' का
अगर अपनी किसी ख़्वाहिश को मारोगे तो समझोगे

— SAAGAR SINGH RAJPUT

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