मुझे भी करेगा कोई याद शायद
अभी गर नहीं तो मिरे बा'द शायद
मुहब्बत है मुझ को पहाड़ों से यारो
मैं पिछले जनम में था फ़रहाद शायद
उसे इन दिनों मैं नहीं याद करता
मुझे इश्क़ कर देगा आज़ाद शायद
न है फ़िक्र अपनी न दुनिया का ग़म है
मैं पूरी तरह से हूँ बर्बाद शायद
नई फ़स्ल भी ज़र्द दिखने लगी है
समय पर नहीं मिल रही खाद शायद
अकेला है परिवार होते हुए भी
निकम्मी है बाबा की औलाद शायद
रब अपना बदलता है हर रोज़ 'सागर'
नहीं सुन रहा कोई फ़रियाद शायद
— SAAGAR SINGH RAJPUT















