वो इंसाँ ज़माने की ख़ातिर बुरा है
जो इंसाँ ज़माने में सच बोलता है
तड़प कर मरा है वफ़ादार आशिक़
यही आशिक़ों की मुनासिब सज़ा है
खिलौनों में दिल उस का लगता नहीं अब
वो दिल से मिरे इसलिए खेलता है
मुझे वो उसे मैं नहीं मिल सकेंगे
मुक़द्दर का शायद यही फ़ैसला है
मैं उस को भुला कर के बन जाऊँ जोगी
मिरे पास बस एक ही रास्ता है
कोई भी ज़रूरी नहीं ज़िंदगी में
मुझे ये सबक़ ज़िंदगी से मिला है
कोई और होता तो मर जाता 'सागर'
मुहब्बत में जो दर्द मैं ने सहा है
— SAAGAR SINGH RAJPUT















