मुझे तुम याद आती हो

मुझे जब बाग़ दिखते हैं
वहाँ जब फूल खिलते हैं
किसी ग़ुंचे से जब भँवरे
हो के मदहोश मिलते हैं
मुझे तुम याद आती हो

मैं जब मंदिर में जाता हूँ
तो रब को सब बताता हूँ
तुम्हारे नाम का दीपक
वहाँ जब भी जलाता हूँ
मुझे तुम याद आती हो

यहाँ जब रात आती है
तो इक चुप्पी सी छाती है
इसी ख़ामोश शब में जब
हवा कुछ गुनगुनाती है
मुझे तुम याद आती हो

मैं जब तन्हा सा होता हूँ
न जगता हूँ न सोता हूँ
इन्हीं तन्हाइयों में जब
बहुत ज़ोरों से रोता हूँ
मुझे तुम याद आती हो

मैं तुम से अब भी डरता हूँ
मैं तुमपे अब भी मरता हूँ
मैं ख़ुद से जब अकेले में
तुम्हारी बात करता हूँ
मुझे तुम याद आती हो

मैं जब तन्हाई चुनता हूँ
तुम्हारे ख़्वाब बुनता हूँ
तुम्हारे बारे में जब भी
मैं कुछ ग़ैरों से सुनता हूँ
मुझे तुम याद आती हो

कोई दिल तोड़ता है जब
कोई दिल जोड़ता है जब
कोई बे-दर्द होकर के
किसी को छोड़ता है जब
मुझे तुम याद आती हो

मई जब जब भी आती है
मुझे जी भर रुलाती है
तुम्हें बचपन नहीं है याद
मुझे जब ये बताती है
मुझे तुम याद आती हो

मैं ख़ुश दिखता हूँ बाहरस
मगर टूटा हूँ अंदर से
कोई जब पूछ लेता है
तुम्हारा नाम सागर से
मुझे तुम याद आती हो

— SAAGAR SINGH RAJPUT

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