
मुहब्बत है मुझे तुझ सेे मगर मैं कह नहीं सकता
मैं तेरे बिन भी ऐ लड़की क़सम से रह नहीं सकता
चली आ तू नदी बनकर मुझे अपना बनाने को
मैं सागर हूँ मिरी जाँ इस लिए मैं बह नहीं सकता
— SAAGAR SINGH RAJPUT
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