सिपाही आज भी कोई नहीं आया

किसी ने फूल ही भेजे
न बस्ती के घरों से आश्ना गीतों की आवाज़ें सुनाई दें
न परचम कोई लहराया
सिपाही! शाम होने आई और कोई नहीं आया
फ़ना की ख़ंदक़ों को जान दे कर पार कर जाना बड़ी बात
जहाँ जीने की ख़ातिर मर रहे हों लोग उस बस्ती में मर जाना बड़ी बात
मगर पल भर को ये सोचा तो होता
तुम्हारे बा'द घर की मुंतज़िर दहलीज़ को जागे हुए दिल की निशानी कौन देगा
हवाओं से उलझती रौशनी को ए'तिबार-ए-कामरानी कौन देगा
दर-ओ-दीवार से लिपटी हुई बेलों को पानी कौन देगा

— Iftikhar Arif

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