मुतमइन नफ़स की आरज़ू में जो भी निकला वो वापस न आयारूह की वहशतों में उलझ करमुतमइन नफ़स की आरज़ू मेंजो भी निकला वो वापस न आयालोग फिर देखते क्यूँ नहीं हैंलोग फिर सोचते क्यूँ नहीं हैंलोग फिर बोलते क्यूँ नहीं हैं— Iftikhar Arif