ऐ ग़में हिज्रां यूँँ रह रह के जलाओ न मुझेवक़्त गुजरा तू भी आ आ के सताओ न मुझेचैन से जीने दे मुझ को ओ मेरे ख़्वाब-ओ-ख़्यालमिट चुकी कब की सुनो ऐसे मिटाओ न मुझे— Jayanti Jha