ham ishq ke maaron ka itna hi fasana hai | हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है

  - Jigar Moradabadi

हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है

  - Jigar Moradabadi

Romantic Shayari

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As you were reading Shayari by Jigar Moradabadi

    सभी अंदाज़-ए-हुस्न प्यारे हैं
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    उस की रातों का इंतिक़ाम न पूछ
    जिस ने हँस हँस के दिन गुज़ारे हैं

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    इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
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    ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है
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    दिल फिर भी मिरा दिल है दिल ही तो ज़माना है

    हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
    रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है

    वो और वफ़ा-दुश्मन मानेंगे न माना है
    सब दिल की शरारत है आँखों का बहाना है

    शाइर हूँ मैं शाइर हूँ मेरा ही ज़माना है
    फ़ितरत मिरा आईना क़ुदरत मिरा शाना है

    जो उन पे गुज़रती है किस ने उसे जाना है
    अपनी ही मुसीबत है अपना ही फ़साना है

    क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है
    हम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है

    आग़ाज़-ए-मोहब्बत है आना है न जाना है
    अश्कों की हुकूमत है आहों का ज़माना है

    आँखों में नमी सी है चुप चुप से वो बैठे हैं
    नाज़ुक सी निगाहों में नाज़ुक सा फ़साना है

    हम दर्द-ब-दिल नालाँ वो दस्त-ब-दिल हैराँ
    ऐ इश्क़ तो क्या ज़ालिम तेरा ही ज़माना है

    या वो थे ख़फ़ा हम से या हम हैं ख़फ़ा उन से
    कल उन का ज़माना था आज अपना ज़माना है

    ऐ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा हाँ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
    आज एक सितमगर को हँस हँस के रुलाना है

    थोड़ी सी इजाज़त भी ऐ बज़्म-गह-ए-हस्ती
    आ निकले हैं दम-भर को रोना है रुलाना है

    ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
    इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

    ख़ुद हुस्न-ओ-शबाब उन का क्या कम है रक़ीब अपना
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    तस्वीर के दो रुख़ हैं जाँ और ग़म-ए-जानाँ
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    ये हुस्न-ओ-जमाल उन का ये इश्क़-ओ-शबाब अपना
    जीने की तमन्ना है मरने का ज़माना है

    मुझ को इसी धुन में है हर लहज़ा बसर करना
    अब आए वो अब आए लाज़िम उन्हें आना है

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    अब दिल को ख़ुदा रक्खे अब दिल का ज़माना है

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    Jigar Moradabadi
    शाएर-ए-फ़ितरत हूँ जब भी फ़िक्र फ़रमाता हूँ मैं
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    आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
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    जब मकान-ओ-ला-मकाँ सब से गुज़र जाता हूँ मैं
    अल्लाह अल्लाह तुझ को ख़ुद अपनी जगह पाता हूँ मैं

    तेरी सूरत का जो आईना उसे पाता हूँ मैं
    अपने दिल पर आप क्या क्या नाज़ फ़रमाता हूँ मैं

    यक-ब-यक घबरा के जितनी दूर हट आता हूँ मैं
    और भी उस शोख़ को नज़दीक-तर पाता हूँ मैं

    मेरी हस्ती शौक़-ए-पैहम मेरी फ़ितरत इज़्तिराब
    कोई मंज़िल हो मगर गुज़रा चला जाता हूँ मैं

    हाए-री मजबूरियाँ तर्क-ए-मोहब्बत के लिए
    मुझ को समझाते हैं वो और उन को समझाता हूँ मैं

    मेरी हिम्मत देखना मेरी तबीअत देखना
    जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूँ मैं

    हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है
    अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं

    तेरी महफ़िल तेरे जल्वे फिर तक़ाज़ा क्या ज़रूर
    ले उठा जाता हूँ ज़ालिम ले चला जाता हूँ मैं

    ता-कुजा ये पर्दा-दारी-हा-ए-इश्क़-ओ-लाफ़-ए-हुस्न
    हाँ सँभल जाएँ दो-आलम होश में आता हूँ मैं

    मेरी ख़ातिर अब वो तकलीफ़-ए-तजल्ली क्यूँ करें
    अपनी गर्द-ए-शौक़ में ख़ुद ही छुपा जाता हूँ मैं

    दिल मुजस्सम शेर-ओ-नग़्मा वो सरापा रंग-ओ-बू
    क्या फ़ज़ाएँ हैं कि जिन में हल हुआ जाता हूँ मैं

    ता-कुजा ज़ब्त-ए-मोहब्बत ता-कुजा दर्द-ए-फ़िराक़
    रहम कर मुझ पर कि तेरा राज़ कहलाता हूँ मैं

    वाह-रे शौक़-ए-शहादत कू-ए-क़ातिल की तरफ़
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    या वो सूरत ख़ुद जहान-ए-रंग-ओ-बू महकूम था
    या ये आलम अपने साए से दबा जाता हूँ मैं

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    वो जफ़ा करते हैं मुझ पर और शरमाता हूँ मैं

    एक दिल है और तूफ़ान-ए-हवादिस ऐ 'जिगर'
    एक शीशा है कि हर पत्थर से टकराता हूँ मैं
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    Jigar Moradabadi
    जो उन पे गुज़रती है किस ने उसे जाना है
    अपनी ही मुसीबत है अपना ही फ़साना है
    Jigar Moradabadi
    यूँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर
    जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
    Jigar Moradabadi
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