हम भटकते रहे हैं यहाँ दर-ब-दरतुम ने आ कर के जीवन सँवारा प्रियेजब मेरे दर्द की इंतिहाँ हो गईमैं ने पन्नों पे तुम को उतारा प्रिये— Jitendra "jeet"