
नहीं है चाह जिस्मों की न दौलत चाहिए तेरी
मिले दिल में जगह तेरे वहीं दुनिया बसा लूँगा
मुहब्बत ही नहीं तुम से मिरी जान-ए-जिगर हो तुम
ज़रा सा सब्र तो कर लो तुम्हें अपना बना लूँगा
— Jitendra "jeet"
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