हम इश्क़-ए-मजाज़ी पर इल्ज़ाम ये धरते हैं
ये 'इश्क़ न हो यारों इस 'इश्क़ से डरते हैं
पहले तो ये कहते थे हर हाल में रह लेंगे
अब देख के हालों को बातों से मुकरते हैं
क्या ख़ाक गुज़ारेंगे वो 'उम्र मुहब्बत में
इक 'उम्र का कहकर जो पल भर ही ठहरते हैं
आते हैं जो इस दिल में इक बात से ही यारों
इक बात से ही गोया दिल से वो उतरते हैं
मायूब मुझे कहकर वाबस्ता है औरों से
ऊपर से सितम देखो सजते हैं सॅंवरते हैं
तज़लील हुए इतने जा कर के खुली छत पर
ख़ुद अपने परों को हम दाँतों से कतरते हैं
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