कैसे कह दूँ कि मोहब्बत में ख़सारा न हुआ

डूबते को किसी तिनके का सहारा न हुआ

पेश आते हैं वो अब मुझ से रक़ीबों की तरह
एक पल जिन का बिना मेरे गुज़ारा न हुआ

जैसे महफ़िल में वो रिंदाँ से गले लग के मिले
शौक़ ये उन का मेरे दिल को गवारा न हुआ

मुंतज़िर कौन हो हम जैसे ग़रीबों का भला
महफ़िल-ए-यार में जब कोई हमारा न हुआ

वो अभी इश्क़ के अंजाम से वाक़िफ़ ही नहीं
इश्क़ में फ़र्क कहाँ गर वो हमारा न हुआ

अब रुलाते हैं मोहब्बत में जो रोते थे कभी
दिल दुखाने का कभी ऐसा नज़ारा न हुआ

याद आते थे वो हर रोज़ दु'आओं में हमें
इश्क़ फिर वैसा कभी हम को दुबारा न हुआ

— Anand Sharma

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