तन के दुगने गुमाँ से उठता है
जो तिरे आस्ताँ से उठता है
क़ाफ़िरों का हुजूम देखा था
पूछना है कहाँ से उठता है
घाव तो भर चुका मगर ये दर्द
रह के उस के निशाँ से उठता है
इक तअल्लुक़ हर उस फ़रीदस है
जो तिरे आशियाँ से उठता है
— Karal 'Maahi'
जो तिरे आस्ताँ से उठता है
क़ाफ़िरों का हुजूम देखा था
पूछना है कहाँ से उठता है
घाव तो भर चुका मगर ये दर्द
रह के उस के निशाँ से उठता है
इक तअल्लुक़ हर उस फ़रीदस है
जो तिरे आशियाँ से उठता है
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