अभी नींदें ही तो उस ने चुराई है

मुसीबत तो अभी आनी ही बाक़ी है

सहर हो जाए जब वो खोले हैं पलकें
वो फैलाती हैं ज़ुल्फ़ें शाम ढलती है

वो जब हँसती है तो दिन मुस्कुराता है
वो जब रोती है तो बारिश हो जाती है

मिरी ये ग़ज़लें सारी उस के सदक़े दोस्त
वो भी तो मुझ पे नज़्में लिक्खा करती है

मियाँ कोई बुरी आदत नहीं मुझ में
फ़क़त सिगरेट से ही मेरी यारी है

फ़क़त मुझ
में बुराई है नहीं ऐसा
यहाँ हर शख़्स में कुछ तो बुराई है

गुज़रती है किसी कूचे से वो जब दोस्त
तो चारों सम्त ख़ुशबू फैल जाती है

दुबारा कह रहे हो तुम मुहब्बत को
ज़रा हालत मिरी देखो न कैसी है

— Rovej sheikh

More by Rovej sheikh

Other ghazal from the same pen

See all from Rovej sheikh →

Poverty Shayari

Shers of poverty.

All Poverty Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling