घर के कुछ हिस्से लगे हैं
दाव पर रिश्ते लगे हैं
कल से दीवारें उठेंगी
आज दरवाज़े लगे हैं
मेरा हिस्सा छीनने को
सारे के सारे लगे हैं
देख हालत ख़ुद-ब-ख़ुद ही
हम अलग होने लगे हैं
ख़ून के रिश्तों से ही हम
इतना क्यूँ डरने लगे हैं
मेरी आँखों पर ज़बाँ पर
रात दिन पहरे लगे हैं
मर के भी ज़िंदा थे जो लोग
फिर से वो मरने लगे हैं
— Kinshu Sinha















