"इश्क़"
तुम्हारे साथ कुछ शरारतें
बस जाती है कहीं
यादों में
पर तुम से दूर
सर्दी में गर्म रेत की तरह
उतरता ही नहीं तुम्हारा फ़ितूर
उतरता ही नहीं आँखों से तुम्हारा नूर
सम्भलता ही नहीं
बिखर के वो तुम्हारा मुस्कुराना
लबों पे मानो सिमटता ही नहीं
रोकूँ मैं कितना ये दिल खो ही जाता है
क्या करूँ तुम से इश्क़ हो ही जाता है
— Kuwar Prateek Singh















