अधूरी रही ये तलब आशिक़ी कीमुकम्मल जो कलतक था वो सब धुआँ हैये ज़हमत,ये तोहमत, ये रातों का जगनातुम्हें चाहना सब के बस का कहाँ है— Kuwar Prateek Singh