bachi hai raushni jo bhi charaagon se nikal jaa.e | बची है रौशनी जो भी चराग़ों से निकल जाए

  - Kushal Dauneria

बची है रौशनी जो भी चराग़ों से निकल जाए
जो मेरे दिल से निकला है दुआओं से निकल जाए

हम ऐसे लोग जो दुश्मन के रोने पर ठहर जाएँ
वो ऐसा शख़्स जो अपनों की लाशों से निकल जाए

पढ़ाने का अगर मतलब है हाथों से निकल जाना
ख़ुदाया फिर मिरी बेटी भी हाथों से निकल जाए

वही इक शख़्स था मेरा यहाँ पर जी लगाने को
उसी को चाहते थे सब कि गाँव से निकल जाए

इधर तो छू रही है जिस्म मेरा ठंडे हाथों से
उधर वो चाहती है रात बातों से निकल जाए

नुमाइश बाप की दौलत की कर के सोचता था मैं
कि शायद इम्तिहान-ए-इश्क़ पैसों से निकल जाए

  - Kushal Dauneria

Dushman Shayari

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