जिस्म क़ैद करती है वो जान छोड़ देती हैमूल मूल रखती है लगान छोड़ देती हैजान-ए-जाँ तुझे पता नहीं महाज़-ए-इश्क़ मेंबे-वफ़ाई होंठ पर निशान छोड़ देती हैकैसे हम परिंदों को शिकारी का पता लगेतीर छोड़ते ही वो कमान छोड़ देती है— Kushal Dauneria