mere qabeele mein ta'leem ka rivaaj na tha | मिरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था

  - Liaqat Jafri

मिरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था
मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे

  - Liaqat Jafri

More by Liaqat Jafri

As you were reading Shayari by Liaqat Jafri

    हालाँकि पहले दिन से कहा जा रहा हूँ मैं
    लेकिन कहाँ किसी को सुना जा रहा हूँ मैं

    लाचार ओ बद-हवास घने जंगलों के बीच
    दरिया के साथ साथ चला जा रहा हूँ मैं

    पछता रहे हैं सब मिरा पिंजर निकाल कर
    दीवार में दोबारा चुना जा रहा हूँ मैं

    हालाँकि पहले साए से रहती थी कश्मकश
    अब अपने बोझ से ही दबा जा रहा हूँ मैं

    तेरे सँभालने से भी पकड़ी न मैं ने आग
    अब और भी ज़ियादा बुझा जा रहा हूँ मैं

    पहले-पहल तो ख़ुद से ही मंसूब थे ये अश्क
    अब उस की आँख से भी बहा जा रहा हूँ मैं

    ये दिन भी कैसा सख़्त शिकंजा है 'जाफ़री'
    अब जिस पे सारी रात कसा जा रहा हूँ मैं
    Read Full
    Liaqat Jafri
    उसी के दम पे तो ये दोस्ती बची हुई थी
    हमारे बीच में जो हम-सरी बची हुई थी

    हमारे बीच में इक पुख़्तगी बची हुई थी
    बची हुई थी मगर आरज़ी बची हुई थी

    उसी के नूर से ये रौशनी बची हुई थी
    मिरे नसीब में जो तीरगी बची हुई थी

    उसी के दम पे मनाया था उस ने जश्न मिरा
    कि दुश्मनी में भी जो दोस्ती बची हुई थी

    कमाल ये था कि हम बहस हार बैठे थे
    हमारे लहजे की शाइस्तगी बची हुई थी

    अगरचे ख़त्म थे रिश्ते पड़ोसियों वाले
    हमारे बीच में हमसायगी बची ही थी

    बदल चुका था वो अपना मिज़ाज मेरे लिए
    मगर दिखावे को इक बे-रुख़ी बची हुई थी

    उसी के नूर से पुर-नूर था ये सारा जहाँ
    हमारी आँख में जो रौशनी बची हुई थी

    अब इस मक़ाम पे पहुँचा दिया था हम ने इश्क़
    जुनून ख़त्म था दीवानगी बची हुई थी

    उसी ने जोड़ के रक्खा हुआ था रिश्ते को
    हमारे बीच में जो बरहमी बची हुई थी

    इस एक बात की शर्मिंदगी ने मार दिया
    मिरे वजूद तिरी तिश्नगी बची हुई थी

    उबूर कर लिया सहरा तो फिर से लौट आए
    जुनून बाक़ी था आशुफ़्तगी बची हुई थी

    मैं गाहे-गाहे उसे याद कर ही लेता था
    इसी बहाने मिरी ज़िंदगी बची हुई थी

    उसी के दम पे पढ़े भी गए सुने भी गए
    हमारे लहजे में जो चाशनी बची हुई थी

    ज़माने तेरी हुनर-कोश रज़्म के हाथों
    मैं लुट चुका था मगर शाएरी बची हुई थी

    वो कौन राज़ था जिस को बयान कर न सके
    वो कौन बात थी जो 'जाफ़री' बची हुई थी
    Read Full
    Liaqat Jafri
    रौनक़-ए-दामन-ए-सद-चाक कहाँ से लाएँ
    शहर में दश्त की पोशाक कहाँ से लाएँ

    हालत-ए-जज़्ब में इदराक कहाँ से लाएँ
    ज़हर के वास्ते तिरयाक कहाँ से लाएँ

    गर्द-हा-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक कहाँ से लाएँ
    इस क़दर गर्दिश-ए-अफ़्लाक कहाँ से लाएँ

    पानी ले आए हैं अब एक नई उलझन है
    कूज़ा-गर तेरे लिए ख़ाक कहाँ से लाएँ

    चेहरा-मोहरा तो बहर-हाल दमक ही लेगा
    ताबिश-ए-चश्मा-ए-नम-नाक कहाँ से लाएँ

    तुझ को बिल्कुल नहीं एहसास-ए-हुनर ऐ दरिया
    अब तिरे वास्ते तैराक कहाँ से लाएँ

    ख़ाक-ज़ादे हैं सो बस एक ही रंगत है नसीब
    ख़ुद में सद-रंगी-ए-अफ़्लाक कहाँ से लाएँ

    हम भी जी भर के तुझे कोसते फिरते लेकिन
    हम तिरा लहजा-ए-बे-बाक कहाँ से लाएँ
    Read Full
    Liaqat Jafri
    कितना दुश्वार है जज़्बों की तिजारत करना
    एक ही शख़्स से दो बार मोहब्बत करना

    जिस को तुम चाहो कोई और न चाहे उस को
    इस को कहते हैं मोहब्बत में सियासत करना

    सुरमई आँख हसीं जिस्म गुलाबी चेहरा
    इस को कहते हैं किताबत पे किताबत करना

    दिल की तख़्ती पे भी आयात लिखी रहती हैं
    वक़्त मिल जाए तो उन की भी तिलावत करना

    देख लेना बड़ी तस्कीन मिलेगी तुम को
    ख़ुद से इक रोज़ कभी अपनी शिकायत करना

    जिस में कुछ क़ब्रें हों कुछ चेहरे हों कुछ यादें हों
    कितना दुश्वार है उस शहर से हिजरत करना
    Read Full
    Liaqat Jafri
    किसी गिर्दाब की फेंकी पड़ी है
    लब-ए-साहिल जो इक कश्ती पड़ी है

    हक़ीक़त में वही सीधी पड़ी है
    मुझे इक चाल जो उल्टी पड़ी है

    सफ़र उलझा दिए हैं उस ने सारे
    मिरे पैरों में जो तेज़ी पड़ी है

    वो हंगामा गुज़र जाता उधर से
    मगर रस्ते में ख़ामोशी पड़ी है

    मिरे कानों की ज़द पर हैं मनाज़िर
    मिरी आँखों में सरगोशी पड़ी है

    हुआ है क़त्ल बेदारी का जब से
    ये बस्ती रात दिन सोई पड़ी है

    ये मिस्रा मैं अधूरा छोड़ता हूँ
    मिरे बस्ते में इक तख़्ती पड़ी है

    पतंग कटने का बाइस और है कुछ
    अगरचे डोर भी उलझी पड़ी है

    ज़रा कोयल का पिंजरा खुल गया था
    अभी तक ख़ौफ़ से सहमी पड़ी है

    मुकम्मल एक दुनिया और भी है
    जो इक दुनिया की अन-देखी पड़ी है

    बड़ी बंजर थी ये खेती 'लियाक़त'
    मगर कुछ रोज़ से सींची पड़ी है
    Read Full
    Liaqat Jafri

Similar Writers

our suggestion based on Liaqat Jafri

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari