कोई काँटा न हो गुलाबों में
ऐसा मुमकिन है सिर्फ़ ख़्वाबों में
दिल को कैसे क़रार आता है
ये लिखा ही नहीं किताबों में
इतने सीधे सवाल थे मेरे
वो उलझता गया जवाबों में
मैं ही उस का ग़ुरूर था दानिश
और मुझी को रखा ख़राबों में
— Madan Mohan Danish
ऐसा मुमकिन है सिर्फ़ ख़्वाबों में
दिल को कैसे क़रार आता है
ये लिखा ही नहीं किताबों में
इतने सीधे सवाल थे मेरे
वो उलझता गया जवाबों में
मैं ही उस का ग़ुरूर था दानिश
और मुझी को रखा ख़राबों में
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