चली है इस तरह इक चाल औरत ने
बिछाया है लबों से जाल औरत ने
उदासी में मुझे जो देख पाए तुम
किया मेरा बुरा ये हाल औरत ने
यहाँ हर बार अपनी इक चतुरता से
न गलने दी किसी की दाल औरत ने
मोहब्बत से भरोसा उठ गया मेरा
किया फिर आदमी बेहाल औरत ने
वफ़ा मुझ से न वो जब कर सकी तो फिर
किया ग़म से है माला-माल औरत ने
कभी जो जाँचने की बात गर आई
दिए वादे हॅंसी में टाल औरत ने
मुझे उस ने कहीं का भी न छोड़ा है
किया बर्बाद फिर इस साल औरत ने
— Manish watan















