आरज़ू ही रही मुझ को कोई महबूब मिले

ये भी क्या ख़ूब रही जो मिले मायूब मिले

दूर मुझ से रहे तस्कीन-ओ-सआदत हर दम
ग़म ज़माने के सभी मुझ से ही मंसूब मिले

मैं अकेला तो नहीं जिस पे क़यामत टूटी
कुछ ज़ियादा ही जहाँ में मुझे मकरूब मिले

ख़ून-ए-दिल से लिखे पैग़ाम हज़ारों लेकिन
सब में इन्कार ही था उस के जो मकतूब मिले

सब के दावे मिरे होने के रहे दावे महज़
ज़िंदगी में मुझे बस ऐसे ही मसहूब मिले

रहनुमाई के लिए एक भी रहबर न मिला
रास्तों के बने दीवार मगर ख़ूब मिले

ये भी अच्छा ही हुआ चोट लगी दिल पे 'उमर'
इस बहाने ही सही जीने के उस्लूब मिले

— Mohiuddin Qamaruddin Ansari

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