अब कहाँ वो गर्म-जोशी वो कशिश वाबस्तगी में
लग गई हो ज़ंग जैसे ख़ुश-मिज़ाजी ख़ुश-दिली में
कुछ अलग दिखने की चाहत कुछ अलग करने की मंशा
कुछ बचा भी तो नहीं इस के सिवा अब आगही में
ख़ून पानी हो गया है बे-मुरव्वत हो गए हम
जी रहे हैं हम न जाने किस तरह की बे-हिसी में
शोर भी है भीड़ भी है क्या नहीं इस शहर में है
फिर भी जाने क्यूँ अकेलापन लगे है ज़िंदगी में
अब उख़ूव्वत हो गई है दास्ताँ बीते दिनों की
तफ़रिक़ा करने लगा है आदमी ही आदमी में
कौन है किस को पुकारें ज़िंदगी की रहगुज़र पर
यूँ मुसाफ़िर तो बहुत हैं पर सभी हैं हड़बड़ी में
जैसे दिखते हो 'उमर' वैसे ही आ जाया करो तुम
इस दिखावे में कहाँ वो बात जो है सादगी में
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














