ख़ुद में ही नक़्स बेशतर देखा
जब गिरेबाँ में झाँक कर देखा
यूँ तो दुनिया भी देख ली लेकिन
ख़ुद को ही मैं ने मुख़्तसर देखा
ग़म भुलाने को पी तो ली थोड़ी
इस के बर-अक्स पर असर देखा
तन पे जिन के लिबास थे उजले
मन से उन को ही फ़ित्ना-गर देखा
कोई रहबर मिला नहीं मुझ को
मैं ने हर एक रहगुज़र देखा
आ गई मुझ को भी ग़ज़ल-गोई
मैं ने जब तुम को इक नज़र देखा
पार लगती भी कैसे कश्ती 'उमर'
मैं ने हर बूँद में भँवर देखा
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari















