रिज़्क़ की काविश में मेरी घिस गई थीं जूतियाँ
तब कहीं जा कर मिली थीं खाने को दो रोटियाँ
मुब्तला हर आदमी था ज़र-ज़मीं की हिर्स में
फिर भी ख़ाली ही गई हैं हर किसी की मुट्ठियाँ
बन गई है इक दुकान अब तो इबादत-गाह भी
नाम ले कर सब ख़ुदा का भर रहे हैं झोलियाँ
अब कहीं मिलती नहीं इन्सानियत ढूँढे से भी
नोंचने में सब लगे हैं दूसरों की बोटियाँ
साँस भी मर्ज़ी से लेना था बहुत मुश्किल भरा
हर क़दम पे लग रही थीं ज़िंदगी की बोलियाँ
हर कोई उलझा हुआ है ज़िंदगी की जंग में
हर कोई सुलझा रहा है ज़िंदगी की गुत्थियाँ
ज़िंदगी इक इम्तिहाँ है खेल मत समझो 'उमर'
मुश्किलों से पार लगती हैं सभी की कश्तियाँ














