ये न सोचा था कभी इतना बदल जाएँगे

अपनी ही जड़ से बहुत दूर निकल जाएँगे

लोग जिन ऐब से करते रहे परहेज़ कभी
किस को मालूम था किरदार में ढल जाएँगे

क्या ख़बर थी कि मिलेगा ये शराफ़त का सिला
ग़ैर बन के मेरे अपने मुझे छल जाएँगे

अनसुनी करते रहे रोज़ मुअज़्ज़िन की सदा
रोज़ ही रोज़ ये कहते रहे कल जाएँगे

दौर वो भी था परखते थे खरे-खोटे को
आज मामूल में सारे ही हैं चल जाएँगे

रेत जैसी ही जहाँ में है हक़ीक़त अपनी
वक़्त के हाथ से इक रोज़ फिसल जाएँगे

किसलिए इतना ग़ुरूर अपनी शबाहत पे करुँ
दफ़्न हो कर ये मेरे साथ ही गल जाएँगे

वक़्त के हाथ है तक़दीर भी तलवारें भी
कैसे ये सोच भी लें बच के निकल जाएँगे

शहर पत्थर का हुआ लोग भी पत्थर के 'उमर'
मोम दिल कोई नहीं है जो पिघल जाएँगे

— Mohiuddin Qamaruddin Ansari

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