दिल के तीं आतिश-ए-हिज्राँ से बचाया न गया

घर जला सामने पर हम से बुझाया न गया

दिल में रह-ए-दिल में कि में'मार-ए-क़ज़ा से अब तक
ऐसा मतबू-ए-मकाँ कोई बनाया न गया

कभू आशिक़ का तिरे जबहे से नाख़ुन का ख़राश
ख़त-ए-तक़्दीर के मानिंद मिटाया न गया

क्या तुनुक-हौसला थे दीदा-ओ-दिल अपने आह
एक दम राज़-ए-मोहब्बत का छुपाया न गया

दिल जो दीदार का क़ातिल के बहुत भूका था
उस सितम-कुश्ता से इक ज़ख़्म भी खाया न गया

मैं तो था सैद-ए-ज़बूँ सैद-गह-ए-इश्क़ के बीच
आप को ख़ाक में भी ख़ूब मिलाया न गया

शहर-ए-दिल-ए-आह अजब जाए थी पर उस के गए
ऐसा उजड़ा कि किसी तरह बसाया न गया

आज रुकती नहीं ख़ा
में की ज़बाँ रखिए मुआ'फ़
हर्फ़ का तूल भी जो मुझ से घटाया न गया

— Meer Taqi Meer

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