कब तलक ये सितम उठाइएगा

एक दिन यूँही जी से जाइएगा

शक्ल तस्वीर-ए-बे-ख़ुदी कब तक
कसो दिन आप में भी आइएगा

सब से मिल चल कि हादसे से फिर
कहीं ढूँडा भी तो न पाइएगा

न मूए हम असीरी में तो नसीम
कोई दिन और बाव खाइएगा

कहियेगा उस से क़िस्सा-ए-मजनूँ
या'नी पर्दे में ग़म सुनाइएगा

उस के पा-बोस की तवक़्क़ो' पर
अपने तीं ख़ाक में मिलाइएगा

उस के पाँव को जा लगी है हिना
ख़ूब से हाथ उसे लगाइएगा

शिरकत-शैख़-ओ--ब्रहमन से 'मीर'
का'बा-ओ-दैर से भी जाइएगा

अपनी डेढ़ ईंट की जद्दी मस्जिद
किसी वीराने में बनाइयेगा

— Meer Taqi Meer

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