ख़्वाहिशों की सहर देखते हैंहम कहीं भी अगर देखते हैंलोग वाक़िफ नहीं तिश्नगी सेऔर उस की नज़र देखते हैंइस क़दर ख़ौफ़ है ज़िंदगी कामौत को सर-ब-सर देखते हैं— Ankur Mishra