सोचता हूँ गली से तिरी आते जाते हुए
लग न जाए कहीं दाग़ दामन बचाते हुए
मुद्दतों बा'द आया है मिलने वो मुझ से कहीं
हो न जाए ख़ता फिर गले से लगाते हुए
जिस्म पे अब तलक है मिरे वो निशाँ जो कभी
दे गया था कोई नाम अपना मिटाते हुए
— Ankur Mishra
लग न जाए कहीं दाग़ दामन बचाते हुए
मुद्दतों बा'द आया है मिलने वो मुझ से कहीं
हो न जाए ख़ता फिर गले से लगाते हुए
जिस्म पे अब तलक है मिरे वो निशाँ जो कभी
दे गया था कोई नाम अपना मिटाते हुए
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