आशनाई तोड़ने का ढब मुनासिब लग रहा है
दौर ऐसा है कि सब को सब मुनासिब लग रहा है
ग़ैर-आदम मन हमारे कर रहा है बुत समझ कर
और हम को कल का आया रब मुनासिब लग रहा है
हर भले किरदार के भीतर है कोई चोट खाया
हर बुरे किरदार को ये फब मुनासिब लग रहा है
झाँककर माज़ी को देखो क्या चुना था क्या मिला है
था कहाँ कुछ भी जो तुम को अब मुनासिब लग रहा है
— Krishna Mishra















