क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो

ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

लाल डोरे तिरी आँखों में जो देखे तो खुला
मय-ए-गुल-रंग से लबरेज़ हैं पैमाने दो

ठहरो तेवरी को चढ़ाए हुए जाते हो किधर
दिल का सदक़ा तो अभी सर से उतर जाने दो

मना क्यूँ करते हो इश्क़-ए-बुत-ए-शीरीं-लब से
क्या मज़े का है ये ग़म दोस्तो ग़म खाने दो

हम भी मंज़िल पे पहुंच जाएँगे मरते खपते
क़ाफ़िला यारों का जाता है अगर जाने दो

एक आलम नज़र आएगा गिरफ़्तार तुम्हें
अपने गेसू-ए-रसा ता-ब-कमर जाने दो

सख़्त-जानी से मैं आरी हूँ निहायत ऐ 'तल्ख़'
पड़ गए हैं तिरी शमशीर में दंदाने दो

हश्र में पेश-ए-ख़ुदा फ़ैसला इस का होगा
ज़िंदगी में मुझे उस गब्र को तरसाने दो

गर मोहब्बत है तो वो मुझ से फिरेगा न कभी
ग़म नहीं है मुझे ग़म्माज़ को भड़काने दो

वाइ'ज़ों को न करे मनअ' नसीहत से कोई
मैं न समझूँगा किसी तरह से समझाने दो

रंज देता है जो वो पास न जाओ 'सय्याह'
मानो कहने को मिरे दूर करो जाने दो

— Miyan Dad Khan Sayyah

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