sataati hain rulaati hain mujhe yaaden december ki | सताती हैं रुलाती हैं मुझे यादें दिसम्बर की

  - Munazzah Noor

सताती हैं रुलाती हैं मुझे यादें दिसम्बर की
जगाती हैं जलाती हैं मुझे रातें दिसम्बर की

ख़तों का इक लिफ़ाफ़ा और कुछ तोहफ़े मोहब्बत के
सलामत हैं मिरे लॉकर में सौग़ातें दिसम्बर की

मुझे महसूस होती है तुम्हारे लम्स की गर्मी
मुझे सर्दी में सुलगाएँ ये तासीरें दिसम्बर की

कि जिस पहलू में तुम ने ग़ैर को अपने बिठाया है
उसी पहलू में गुज़री हैं मिरी शा
में दिसम्बर की

तुम्हारे साथ मौसम का मज़ा कुछ और था अब तो
बहुत बीमार करती हैं ये बरसातें दिसम्बर की

  - Munazzah Noor

Sardi Shayari

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