रिदा उस चमन की उड़ा ले गईदरख़्तों के पत्ते हवा ले गईजो हर्फ़ अपने दिल के ठिकानों में थेबहुत दूर उन को सदा ले गईचला मैं सऊबत से पुर राह परजहाँ तक मुझे इंतिहा ले गईगई जिस घड़ी शाम-ए-सेहर-ए-वफ़ामनाज़िर से इक रंग सा ले गईनिशाँ इक पुराना किनारे पे थाउसे मौज-ए-दरिया बहा ले गई'मुनीर' इतना हुस्न उस ज़माने में थाकहाँ उस को कोई बला ले गई— Muneer Niyazi