काबा काशी, गंगा जमना, कूचा और बाज़ार सखी
उसके दो नैनों के आगे सब कुछ है बेकार सखी
उसका माथा हिम पर्बत सा ऊँचा और चमकीला है
और उसके कोमल अधरों से बहती है रसधार सखी
उसकी ज़ुल्फ़ें काली शब हैं, शाने उगते सूरज से
और ये रातें चूम रही हैं दिन को बारम्बार सखी
श्वेत हिरन के जैसे मेरे पोरे और उसका सीना
शब के जंगल छान रहे हैं पाँचों पक्के यार सखी
इक यूसुफ़ है जिसकी ख़ातिर उँगलियाँ काटे बैठी हूँ
एक मसीहा के चक्कर में हो गई हूँ बीमार सखी
हम दोनों के यार सखी री सब के सब अलबेले हैं
मैं लैला की पक्की सहेली वो मजनू के यार सखी
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