जब से उस ने नम आँखों में काजल पहना है
उस राधा प्यारी ने मुझ को मोहन कहना है
इतनी सीधी सादी है बृजभूमि किशोरी है
उस का हँसना उस का खिलना उस का गहना है
ऐसी कोई बात नहीं जो बिछड़न हो जाए
छोड़ के दुनियादारी सब बरसाने रहना है
देख सखी तू जावे तो फिर जा तू अपने घर
हम को तो हर हाल में कान्हा के संग रहना है
राह तकी है वृन्दावन में भरी दुपहरी में
और सहेंगे जो कुछ भी हो हम को सहना है
— nakul kumar















